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संथारा पर बैन के बाद भी जैन मुनि आध्यात्म सागर ने त्यागे प्राण, छोड़ दिया था खाना-पीना

रायपुर/दुर्ग., August 13, 2015: जयपुर हाईकोर्ट द्वारा संथारा (सल्लेखना) को अपराध बताए जाने के तीन दिन बाद ही दुर्ग में जैन मुनि आध्यात्म सागर ने प्राण त्याग दिए हैं। आध्यात्म सागर ने पांच दिन पहले ही अन्न जल छोड़ दिया था, सल्लेखना के लिए वे दमोह से दुर्ग आए थे। जैन मुनि की महासमाधि के बाद August 13 को दुर्ग के खंडेलवाल भवन से जलाराम वाटिका तक उनकी बैकुंठी (शोभायात्रा) निकाली गई, जिसमें बड़ी तादाद में श्रद्धालु शामिल हुए। हाईकोर्ट के फैसले के बाद से ही देशभर के जैन समुदायों की नजर मुनि आध्यात्म सागर पर टिकी हुई थी। मुनि आध्यात्म सागर का संक्षिप्त परिचय : सांसारिक नाम: कपूरचंद, जन्मस्थान: मलगुवां टीकमगढ़, जन्म: सन् 1930

राजस्थान हाईकोर्ट ने 10 अगस्त को एक याचिका पर सुनवाई करते हुए संथारा (सल्लेखना) की परंपरा को आत्महत्या जैसा अपराध बताया था। कोर्ट ने संथारा पर रोक लगाने का आदेश देते हुए कहा था कि संथारा लेने और संथारा दिलाने वाले-दोनों के खिलाफ आपराधिक केस चलना चाहिए। संथारा लेने वालों के खिलाफ आईपीसी की धारा 309 यानी आत्महत्या और संथारा के लिए उकसाने पर धारा 306 के तहत कार्रवाई की जानी चाहिए।

जैन समाज में यह हजारों साल पुरानी प्रथा है। इसमें जब व्यक्ति को लगता है कि उसकी मृत्यु निकट है तो वह खुद को एक कमरे में बंद कर खाना-पीना त्याग देता है। मौन व्रत रख लेता है। इसके बाद किसी भी दिन उसकी मौत हो जाती है। -Dainik Bhaskar

  

    

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